अंतर्मन की गूँज

संघर्षों के दरख्तों पर कामयाबी के फूल खिले ना खिलें
अंधेरो को छान कर भी मंजिलों के निशान मिले न मिलें
हार से हर कर क़दमों की रफ़्तार कभी धीमी ना पड़ेगी
तूफानों से जूझती होंसलों की कश्ती साहिल की ओर बढ़ेगी
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मैं जानता हूँ अपना भाग्य इंसान स्वयं बनाता है
गहरे पानी में पैठ कर ही वह अनमोल मोती पाता है.
क्या हुआ गर तमाम कोशिशें हुईं हैं नाकाम अब तक,
देखते हैं रहती है दूर हमसे सफलता की देवी कब तक,
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मुझे तो अपनी तरफ बढ़ते तूफानों पर तरस आता है,
जबकि मेरे सामने तो मुसीबतों का पहाड़ भी हार जाता है.
देखा है मैंने उफनते सागर को इंसान को रास्ता देते हुए,
डरता हूँ मैं इंसान के आत्म-विश्वास से, काल को भी कहते हुए
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यह देख सुन कर भी अगर मैं थक कर हार मान लेता हूँ.
तो अपनी जिन्दा लाश ढोने को आखिर मैं जन्म क्यों लेता हूँ?

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