क्यों ना बदनाम हुआ जाए?

मुन्नी और शीला में कैसी यह जंग हो गई,
हिंदुस्तान की पूरी जनता इनके संग हो गई.

मुन्नी जहां इक तरफ इज्जत से बदनाम हुई,
तो शीला की जवानी की बात भी सरेआम हुई.

हर बात के मायने आजकल बदलते जा रहे हैं,
लोग बदनामी बटोर कर भी नाम कमा रहे हैं.

अब क्योंकि बदनामी की sale चल ही रही है,
मेरे दिमाग में भी इक scheme पल रही है.

क्यों ना एक ऐसा अलग स्कूल चलाया जाए,
जहां बदनाम होने का फॉरमूला सिखाया जाए.

जहाँ से बच्चे बदनामी की डीग्री ले कर आयें,
और समाज में जाकर एक अच्छा नाम कमाएँ.

शीला की जवानी का चैप्टर भी पढ़ाया जाए,
और मुन्नी की बदनामी का इतिहास बताया जाए.

शीला और मुन्नी की मिसाल सबको बताई जायेगी,
किताबों की जगह फिल्म पत्रिका मंगवाई जायेगी.

माफ कीजियेगा अगर आपको इससे समस्या है,
पर आजकल नाम कमाना भी तो एक तपस्या है.

इसलिए जनहित में मैंने यह तरकीब ढूंढ ली है,
वैसे भी हम सबने अपनी आँख मूँद ली है.

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