मुझे मानव होने पर संदेह होता है!

आजकल मुझे अपने मानव होने पर संदेह होता है,
क्योंकि देखा है मैंने कि पशुओं में भी स्नेह होता है.
मानवता का विस्तार धरती पर सिमटता जा रहा है,
शरीर के चोले से आत्मा का प्राणी मिटता जा रहा है.
वासना का दानव मनुष्य के सिर चढ़ कर बोल रहा है,
अपने ही लहू में ना जाने क्यों मानव विष घोल रहा है.
सुनता हूँ मैं आजकल दानव भी शाकाहारी हो गए हैं
शायद इसी लिए मनुष्य मनुष्य के संहारी हो गए हैं.
बाहर निकलता हूँ तो हर शख्स पिशाच सा दिखता है,
कसाईओं की मंडी में मनुष्य सबसे सस्ता बिकता है.
आज की नारी घर से निकलते हुए भी घबराती है,
क्योंकि सिर्फ पराया ही नहीं अपना भी आघाती है.
लोग कहते हैं कि भगवान ने धरती से आड़ लिया है,
पर वास्तव में उन्होंने भी हमसे पल्ला झाड़ लिया है.
मदद किससे मांगे, रक्षक भी तो भक्षक सा लगता है,
इंसानियत का हर पहरेदार ही यहाँ तक्षक सा लगता है.
इंसानी कोई नहीं है बचा, यह चेहरे सब नकाब हैं,
स्नेह, आदर, मानवता, सौहार्द यह सब ख्बाब हैं.
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