लौटी है हार कर मेरे दर से हार

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आज फिर लौटी है हार कर
मेरे दर से हार,
कहती थी पगली,
संघर्षों के सामने,
विश्वास भी विवश होता है,
हिम्मत की भी तो कोई हद होती है,

बेचारी, उलटे पैर लौटी,
पटक कर सर मेरी चौखट पर,
शायद नहीं पता था उसे,
बैठी है सेंध लगाए वहां,
तूफ़ान भी मांगते हैं,
अपने सलामती की दुआ जहां…

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