हम अब भी ग़ुलाम हैं?

हम अब भी ग़ुलाम हैं?

अब जबकि स्वतंत्रता दिवस आने वाला है तो दो दिन के देशभक्त भी बरसाती मेंढकों की तरह बाहर आ गये होंगे। ट्रैफिक सिग्नल पर तिरंगे में रंगी चीजों की खरीदारी भी शुरू हो गयी होगी। कार के डैशबोर्ड से ऑफिस के वर्कस्टेशन तक तिरंगे में लिप्त हमारी खोखली देशभक्ति अपने होने की झूठी गवाही भी दे रही होगी। इसके अलावा कॉर्पोरेट दफ़्तरों और MNCs में स्वतंत्रता दिवस का भव्य आयोजन भी हो चुका होगा। और इस तरह एक दिन की देशभक्ति ने हमें इतना गौरवान्वित कर दिया होगा कि इस भावना का जश्न आज रात ही शराब के साथ शुरू हो जाएगा जो कि सोमवार तक चलता रहेगा।

और उसके बाद सब बरसाती देशभक्त हैंगओवर को सर पर लादे अपने-अपने कामों पर लौट जायेंगे और शाम तक शराब के हैंगओवर के साथ देशभक्ति का ये हैंगओवर भी हवा हो जाएगा। पर इन सब के बीच मेरे जैसे कुछ गुस्ताख भारतीय भी होंगे जिन्हें ना तो स्वतंत्रता दिवस पर कोई ख़ुशी अनुभव होती है ना ही भारतीय होने पर कोई गर्व। क्यूंकि मुझे नहीं लगता मैं स्वतन्त्र हूँ।

और ये ग़ुलामी उस ग़ुलामी से भी बद्तर है जो हमने दो सौ साल की क्यूंकि हम इस ग़ुलामी बड़ी सफाई के साथ नज़रअंदाज़ कर जाते हैं। हम इस भ्रम में जीते हैं कि हम आज़ाद हैं और जब तक हम इस भ्रम से बाहर नहीं आयेंगे हम आज़ाद होने का प्रयत्न नहीं करेंगे।

अब आप सोच रहे होंगे कि मैं किसका ग़ुलाम हूँ, इसका विचार आपको खुद करना होगा। अपने आसपास देखिये क्या मैं अपने विचार रखने के लिए स्वंत्र हूँ, क्या मैं अपनी पसंद के कपड़े पहनने के लिए स्वतन्त्र हूँ, क्या मैं देर रात अकेले घर आने के लिए स्वतन्त्र हूँ, क्या मैं जाति की परंपरा को बेख़ौफ़ निभाने के लिए स्वतन्त्र हूँ, क्या मैं अपनी मर्ज़ी का खाना खाने के लिए स्वतन्त्र हूँ, क्या कोई ऐसा दिन जाता है जिस दिन मैं किसी भी तरह का अन्याय नहीं सहता, क्या ऐसा कोई वक़्त नहीं आता जब मेरा स्वाभिमान किसी की मनमानी का शिकार नहीं होता।

खुद से प्रश्न पूछिए और इमानदारी से उत्तर दीजिये, मुझे विश्वास है आप किसी ना किसी ग़ुलामी के शिकार अवश्य होंगे जैसे मैं हूँ। और अफ़सोस इस बात का है कि मैं भी उसी तबके से सम्बन्ध रखता हूँ जो हर धर्म का है, हर जाति का है, हर प्रदेश का है, हर प्रांत का है – पर ग़ुलाम है। और ये जानता भी नहीं है कि इन ग़ुलामी के बन्धनों को कैसे तोड़े। खैर हल तो कुछ मेरे पास भी नहीं है पर शब्दों के ज़रिये थोड़ी देर के लिए ही सही पर अभिव्यक्ति की ग़ुलामी से खुद को आज़ाद कराने में कामयाब हो जाता हूँ और भ्रमित हो जाता हूँ।

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