बांस का गरीब कलाकार

बांस का गरीब कलाकार

“भोले शंकर,” शायद यही वे शब्द थे जो मैंने उसके मुँह से पहली बार सुने होंगे।

सांवला रंग, साढ़े 5 फ़ीट कद, चेहरे पर चेचक के निशान और गठीला कद, उसे किसी भी दृष्टि से भयावह बनाता था और बच्चे तो उसे देखते ही छुपने की जगह ढूंढते थे पर उसकी आँखों में कुछ था; एक अजीब सी ख़ुशी और होठों पर चिरपरिचित मुस्कान। मुझे याद नहीं अगर मैंने उसे अभी उदास देखा हो।

सलेट की टपरी की छाया में बैठ कर बांस की तीलियों पर किसी शिल्पकार की सी नज़ाकत से नाचते उसके हाथ कब लकड़ी को तराश कर टोकरी बना देते था मेरे मासूम मन के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था।

ताऊ मेरे लिए भी एक छोटी टोकरी बना दो ना,” मेरी बेवक्त की फरमाईशें पूरी करने में उसने कभी कोताही नहीं बरती।

मगर एक बात तो थी उसमें जो उसे अपने घर काम पर बुला लेना किसी उपलब्धि से कम नहीं था। लोग बुलाते रहते थे और वो वायदा कर भी नहीं आता था। मगर लोग फ़िर भी इंतज़ार करते थे। और करते क्यूँ नहीं, आखिरकार बांस के काम में आसपास के गाँवों में उसका कोई सानी नहीं था। उसे बुलाना जितना मुश्किल था उसकी बनायी टोकरियों की कोई जोड़ ढूंढना उससे भी मुश्किल।

भगत, बेटी की शादी है कुछ बांस का सामान बनना है,” और वो टाल नहीं पाता था।

कुछ साल भर पहले उससे मुलाक़ात हुई थी पर वो कहीं से भी पुराना भगत नहीं था। चेहरे से झांकती झुर्रियां वुढापे का पुरजोर समर्थन करती थीं तो आँखों से नदारद ख़ुशी किसी अनहोनी आशंका की ध्वनि.

बच्चा क्या बताऊँ, चार बेटे हैं पर किसी को कोई परवाह नहीं और बीवी जाने कोन जनम का बदला ले रही है. खाने को भी नहीं पूछती,” किसी के घर पर जर्जर हालत में मिला था भगत।

और उसके बाद आज उसके बारे में कोई खबर मिली. माँ ने बाकी बातों के बीच यूँ ही उल्लेख कर दिया था। “भगत मर गया. पौ फटते ही उन्हीं बांस की छाओं में उसका मृत शरीर मिला जिसके साथ में उसने अपना जीवन बिता दिया।

बीवी ने आँसू नहीं बहाए। बच्चे अंतिम संस्कार पर नहीं आये. आखिर उसने किसी का क्या बिगाड़ा था। “बच्चा अब जीने का मन नहीं करता,” उसके अंतिम शब्द मेरे कानों में रेलवे की उद्घोषना की तरह गूँज रहे थे। जाने कब आँखों के कोर से कुछ बूँदें झर गयीं जो अंतिम संस्कार की लकड़ी ना सही एक भावभीनी श्रधांजली तो जरूर थी।

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