हरिया

मैं कुछ 13-14 साल का रहा हूँगा। पौ फटते नित्य की भांति गोशाला का रुख किया तो दरवाज़ा खोलते ही सामने का दृश्य देख मन पीड़ा से भर उठा। 3 महीने का बछड़ा प्राण त्याग चुका था। रात से ही हालत कुछ नासाज़ थी बेचारे की। कुछ दवा दारू भी की थी और गर्म बिस्तर का भी प्रबंध किया था। पर जाने वाले को कौन रोक सकता है। घर आकर माँ को ख़बर की तो पता चला अब एक व्यक्ति को ढूँढना पड़ेगा जो उसको डिस्पोज करेगा। गाँव के बड़े बूढों ने हरिया नाम का एक व्यक्ति सुझाया जो यूँ तो मज़दूर था पर मुट्ठी भर अनाज़ के लिए ये काम भी करता था।

चलो जी अब भारी मन से निकल पड़े हरिया को लिवा लाने। साथ में एक बंधू को भी ले लिया जो उसका घर जानता था। अभी घर के पिछवाड़े में ही थे कि लोगों की भीड़ देख मन कुछ आशंकित हुआ। आशंका का गला घोट आँगन में जा पहुंचे और एक भले मनुष्य से पूछ बैठे, “अरे भैया, ये हरिया कहाँ है आज।”

ये सुनते ही वो भला मनुष्य हमें ऐसे देखने लगा जैसे उससे उसकी बेटी का हाथ मांग लिया हो। खैर थोडा हत्प्रभ सा बोला, “क्यों तुम्हें नहीं पता हरिया तो कल रात की मर गया। किसी से एक गलास पानी नहीं माँगा बेचारे ने।”

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